Delhi Violence Vs Gujarat 2002 Communal Riots About Hindu-Muslim Problem | 2020 में भी हम 2002 पर ही अटके हुए हैं, भारतीय अभी भी हिंदू-मुस्लिम में ही विभाजित

  • 2002 के बाद 2020 के पहले भारत में 4 बड़े दंगों में 125 मौतें, 3000 से भी अधिक घायल
  • दिल्ली में चार दिनों में 38 की मौत, सरकार का विरोध कब साम्प्रदायिक दंगों में बदल गया, पता ही नहीं चला

Dainik Bhaskar

Feb 27, 2020, 10:39 PM IST

अहमदाबाद. गुजरात के 2002 के साम्प्रदायिक दंगों ने पूरे देश को दहला दिया था। ये दंगे पूर्व नियोजित षड्यंत्र का एक हिस्सा थे। अचानक भड़की आग के बारे में बरसों तक वाद-विवाद चलता रहा है। परंतु 27 फरवरी 2002 को गोधरा रेल्वे स्टेशन में कुछ कारसेवकों और स्टेशन के ही व्यापारियों के बीच हुई तकरार के बाद अचानक आउटर सिगनल पर चेन पुलिंग हुई। देखते ही देखते दो कोच के बीच परदे को चीरकर अंदर कंटेनर से पेट्रोल छिड़का गया और आग लगा दी गई। एस-6 का कोच और उसके अंदर बैठे 58 कारसेवक जलकर मौत के हवाले हो गए। यह बहुत बड़ा भूचाल था…राजनीतिक भूचाल…इसका आफ्टरशॉक इस भूचाल के झटके से भी बड़ा था। गोधरा कांड को लेकर दूसरे दिन बंद का ऐलान किया गया। इस दौरान पूरा गुजरात सुबह से ही हिंसा की चपेट में आ गया। पूरा राज्य आग की चपेट में आ गया। नरोडा पाटिया कांड, बेस्ट बेकरी कांड, दीपड़ा दरवाजा कांड, सरदारपुरा कांड, ओड हत्याकांड, गुलबर्ग सोसायटी जैसे हत्याकांड में अधिकृत आंकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक मौत,  2500 से अधिक घायल और 250 लोग लापता हो गए। अधिकृत आंकड़ों को अनदेखा कर दिया जाए, तो इस दंगे ने 2000 से अधिक लोगों की बलि ले ली।

2020 में दिल्ली की गलियां गुजरात के दृश्यों की याद दिलाती हैं
आज 2020 की बात करें, तो उस समय का गुजरात और आज की दिल्ली में कोई खास फर्क नहीं आया। नागरिकता कानून यानी सीएए के विरोध से शुरू हुए विरोध और प्रदर्शन ने देखते ही देखते हिंसक रूप धारण कर लिया। 2002 में अहमदाबाद या गुजरात की गलियों में जो भयावहता देखी देखी गई थी, आज दिल्ली की गलियों में देखने को मिल रही है। दिल्ली में दो महीनों से चल रही सरकार के खिलाफ विरोध ने पिछले चार दिनों में हिंदू-मुस्लिम के बीच हिंसा का स्वरूप धारण कर लिया है। इसकी आग में अब तक 38 लोग मारे जा चुके हैं और 200 से अधिक लोग घायल हुए हैं। आज दिल्ली की हालत 2002 के गुजरात की याद दिला रही है। इसकी सच्चाई हमें दंगों के शिकार लोगों की चीखों से पता चल रही है। दो दशक बाद भी हम अभी तक वहीं के वहीं हैं। अभी भी हम हिंदू और मुसलमान ही हैं और कुछ नहीं।

20 साल बाद भी साम्प्रदायिक हिंसा में 100 लोग मारे गए
ऐसा नहीं है कि भारत में हिंसा या साम्प्रदायिक दंगों का दौर 2002 के बाद अंतत: 2020 में देखने को मिला। बीच के 20 सालों के दौरान देश में चार बड़े साम्प्रदायिक दंगे हो चुके हैं। इसमें 2005 में उत्तर प्रदेश के मऊ के दंगों में 14 लोगों की मौत, 2006 में गुजरात के वडोदरा में 8 की मौत, 2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर के दंगों में 62 लोगों की मौत, 2017 में उत्तर भारत के हरियाणा, पंजाब, यूपी, राजस्थान, दिल्ली के दंगों में 41 मौतों का समावेश होता है। इसके अलावा 2005 में लखनऊ में 4 मौतें, 2014 में सहारनपुर में 3 मौतें, जैसे साम्प्रदायिक हिंसा की छोटी-बड़ी घटनाएं तो बहुत हुई हैं। परंतु 4 बड़े दंगों में हमारे देश के 125 नागरिक मारे जा चुके हैं। इसमें 2017 में उत्तर भारत का एकमात्र दंगा, जिसमें 41 लोग मारे गए। इसमें हिदू-मुस्लिम साम्प्रादायिक हिंसा को शामिल नहीं किया जा सकता। ये दंगे डेरा सच्चा सौदा के गॉडमैन गुरमीत राम रहीम को दुष्कृत्य के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उनके अनुयायियों द्वारा की गई हिंसा के कारण हुए थे। बाकी की सभी घटनाओं में हिंदू-मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगे को ही कारण माना गया है।

सरकार के खिलाफ विरोध से हुई शुरुआत के कारण दिल्ली में हिंसा 
भारत सरकार के विवादास्पद कानून सिटीजनशिप एमेंडमेंट एक्ट (सीएए) के खिलाफ दिसम्बर 2019 में विरोध शुरू हुआ। इसकी शुरुआत असम से हुई और देखते ही देखते दिल्ली, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा होते हुए पूरे देश में फैल गई। कुछ समय बाद यह विरोध दिल्ली के शाहीन बाग तक ही केंद्रित होकर रह गया। परंतु, इसके पहले दिसम्बर 19 में ही विरोध की इस हिंसा ने 27 लोगों को लील लिया। दिल्ली विधानसभा चुनाव भी एक तरह से हिंदू-मुस्लिम के मुद्दे पर ही लड़े गए। जनवरी में भी हिंसा का यह दौर जारी रहा। ये सभी घटनाएं छुटपुट हिंसा के बीच होती रहीं, जिसमें बीच-बीच में दंगाइयों और पुलिस के बीच झड़पें भी शामिल रहीं। किंतु, पिछले चार दिनों में दिल्ली में जो अराजकता देखने को मिली, वह किसी अनदेखे खतरे की ओर संकेत कर रही है।

2002-2020 में एक ही समानता, पुलिस की निष्क्रियता
2002 के गुजरात दंगों में 2000 लोगों की मौत हुई। पूरे 3 महीने तक राज्य में हिंसा का तांडव चलता रहा। उस समय अहमदाबाद और गुजरात पुलिस की कार्यशैली के खिलाफ अनेक सवाल खड़े किए गए। तीन दिनों तक पूरा गुजरात जला रहा और पुलिस ने कुछ नहीं किया। यह माना जा रहा है कि पुलिस को “ऊपर” से आदेश था कि कुछ न करे। इस तरह के दावे समय-समय पर किए जाते रहे हैं। इसी कारण दंगों का खुला खेल चलता रहा, जिससे हिंसा बढ़ती गई और मौतों का सिलसिला जारी रहा। अब जब दिल्ली में हिंसा का दौर चला, तो यहां भी उसी तरह के दावे-प्रतिदावे किए जा रहे हैं। बुधवार को पत्रकार वार्ता में कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी ने दिल्ली के दंगे पुलिस की निष्क्रियता के कारण हुए, यह बताते हुए गृहमंत्री अमित शाह से इस्तीफे की मांग भी की। अब यह बात सामने आई है कि दिल्ली के हालात को काबू में लाने की जवाबदारी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सौंपी है। दिल्ली पुलिस पर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि उसने हिंसा पर काबू पाने की बात तो दूर, कई स्थानों पर उपद्रवियों की मदद भी की है। लोग विरोध के नाम पर विरोध का दमन करने की आड़ में एक दूसरे को मारने-काटने का काम कर रहे थे और पुलिस दूर खड़ी होकर यह तमाशा देख रही थी, इस तरह की बातें 2002 के गुजरात दंगों के समय भी सुनने को मिली थीं।

2020 में हम भारतीय नहीं, हिंदू या मुसलान ही हैं
इस इक्कीसवीं सदी में हम विकास के क्षेत्र में लगातार प्रगति करने का सपना देख रहे हैं। स्पेस टेक्नालॉजी में हम मंगल तक पहुंच गए। चंद्रयान की तैयारियां चल रही हैं। साइंस एंड टेक्नालॉजी में हमारे वैज्ञानिकों का विश्व में डंका बज रहा है। हमारे खिलाड़ी ओलिम्पिक हो या क्रिकेट, सभी खेलों में अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। प्रगति हमारे प्रारब्ध की कहानी कह रही है। यह सब बोलने-सुनने में अच्छा लगता है। किंतु, हकीकत तो यह है कि भीतर ही भीतर आज 2020 में भी 2002 से आगे ही नहीं बढ़ पाए हैं। कारण साफ है, हम आज भारतीय नहीं, हिंदू या मुसलमान के रूप में ही पहचाने जाते हैं। यही पहचान हम अपने कार्यों से बता भी रहे हैं। यदि ऐसा नहीं होता, तो 2002 से लेकर 2020 तक इतने दंगे हिंदू-मुसलमान के नाम पर नहीं हुए होते।


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