Renowned Actor Akshay Anand Share His Life Journey With Pankaj Shukla In An Exclusive Interview – किस्सागोई: मशहूर अभिनेता अक्षय आनंद ने खोला अमेरिकी कनेक्शन का राज, यूपी के एटा से जुड़ा खास नाता

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अभिनेता अक्षय आनंद को हिंदी सिनेमा में देव आनंद की खोज माना जाता है। पुरखे उनके अंग्रेजों की फौज में रहे, पिता ने एटा में छावनी बसाई और उन्हें बचपन में नाम मिला जॉन गार्डनर। सिनेमा और टेलीविजन में अपने अब तक के सफर और अपनी इस यात्रा के कुछ रोचक किस्सों को अक्षय ने साझा किया पंकज शुक्ल के साथ इस खास बातचीत में।

आपके नाम के साथ जुड़े आनंद की क्या कहानी है? लोग समझते हैं कि ये नाम आपको देव आनंद ने दिया।
नहीं, यह नाम मुझे देव साहब ने नहीं दिया। मैंने जब देव आनंद के साथ पहली फिल्म हम नौजवान की तो उसमें मेरा नाम आता है, जॉनी गार्डनर। देव साहब ने मुझे लॉन्च किया, उसके बाद मैंने आनंद महेंद्रू के साथ एक धारावाहिक किया, इंद्रधनुष। ये तीस साल पहले की बात है। इस दौरान मुझे एक ऐसा नाम रखने की सलाह मिले जिसे भारतीय दर्शक अपना मान सकें। मैंने शर्त रखी कि मैं अपना हिंदी नाम तो रख लूंगा लेकिन मेरे नाम के पीछे आनंद जरूर होना चाहिए। मैंने अपना हिंदी नाम उस शख्स को समर्पित किया जिसने मेरे अंदर के हुनर को पहचाना, और मुझे एक अभिनेता के तौर पर दुनिया से परिचित कराया। उसी समय आनंद ने अपने भतीजे का नाम अक्षय रखा था जिसे उन्होंने मुझे भी दिया। मैंने कहा कि अक्षय आनंद थोड़ा जुबान को तकलीफ देने वाला नाम है। तो उन्होंने कहा कि जो नाम बोलते समय जुबान को तकलीफ देते हैं, वही असरदार होते हैं।

अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन को शपथ दिलाने वाले रॉबर्ट लिंविंग्स्टन आपके पुरखे रहे। ब्रिटिश सेना से आपके परिवार का नाता कैसे जुड़ा है?
मेरे पिताजी ब्रिटिश थे और उनकी ननिहाल अमेरिका की है। अमेरिका की आजादी की उद्घोषणा लिखने वाली समिति में शामिल रॉबर्ट लिविंग्स्टन की बेटी अलाइडा की शादी मुझसे सात पीढ़ी पहले हमारे परिवार के मुखिया वैलेंटाइन गार्डनर से हुई। अमेरिका की आजादी के बाद हमारा परिवार ब्रिटेन आ गया। हमारे परिवार के विलियम गार्डनर ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ अपना परिवार लेकर भारत आए। मेरे पिता एटा की छावनी में रहते थे। ये एक लंबी कथा है। मेरे बड़े भाई का कारोबार अब भी वहां है। अपने परिवार में मैं पहला बच्चा था जिसका जन्म एटा से बाहर हुआ।

तो देव आनंद से कैसे मुलाकात हुई?
दिल्ली के सेंट जेवियर कॉलेज में हम लोग अंग्रेजी में नाटक किया करते थे। बैरी जॉन हमें अभिनय सिखाते थे। वहां से मेरी अभिनय यात्रा शुरू हुई। देव साहब की बेटी देविना से मेरी मुलाकात दिल्ली में हुई तो उन्होंने बताया कि वह कॉलेज के छात्रों को लेकर एक फिल्म बना रहे हैं। आप मुंबई आना तो उनसे मिल लेना। ये फिल्म थी हम नौजवान और इसी फिल्म से तब्बू, बंटी बहल, ऋचा शर्मा को भी लांच किया गया।

सदाबहार अभिनेता कहलाने वाले देव आनंद के अलावा आप निर्माता निर्देशक महेश भट्ट के भी चहीते कलाकार रहे। उनसे पहली मुलाकात का किस्सा क्या है?
निर्माता निर्देशक आनंद एल राय के बड़े भाई रवि राय की वजह से मेरी महेश भट्ट से मुलाकात हुई। उन्होंने मेरे फोटो एक विज्ञापन एजेंसी पर देखे और मुझे फाइनल कर दिया। लेकिन, उन्होंने मेरा नाम पूछा तो जॉन गार्डनर सुनकर वह चौंके। उन्हें यकीन दिलाया गया कि मैं हिंदी बहुत अच्छी बोल लेता हूं। लेकिन मुझे फोन करने से पहले उन्होंने मेरी बहन को फोन किया फिर मेरे घर दिल्ली फोन किया। फिर उन्होंने मुझे फोन करके अगले दिन सुबह नौ बजे दफ्तर बुलाया। मैं उस रात शूटिंग कर रहा था और सुबह शूटिंग खत्म करके सीधे रवि राय से मिलने चला गया। वहां एक बिस्तर पर चौकड़ी मारे भट्ट साहब बैठे हुए हैं। मुझे फर्श पर बैठने को कहा गया तो मैं वहां बिछे कालीन पर बैठ गया। भट्ट साहब ने मुझे देखा और बोले कि तुमने रात भर शराब पी है क्या? तो मैंने जवाब दिया कि नहीं सर मैं रात भर शूटिंग कर रहा था। फिर वह खड़े हुए और उन्होंने रवि से बोला कि इस लड़के को आज ही शाम तक साइन कर लो। इस तरह मुझे करियर की दूसरी फिल्म ‘दो पल’ मिली।

आपने आगरा में एक्टिंग एकेडमी की शुरुआत भी की फिर उसे बंद क्यों कर दिया?
लोग कहते हैं कि अभिनय किसी को सिखाया नहीं जा सकता। मैं इस मिथक को तोड़ना चाहता था। अभिनय भी एक कला है। अगर कला के तौर पर नृत्य सिखाया जा सकता है, गाना सिखाया जा सकता है, तो अभिनय भी सिखाया जा सकता है। मैं आगरा में लोगों को अभिनय सिखा रहा था और यहां अफवाह फैल गई कि मैंने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी है। मैंने एकेडमी खोली थी कि महीने में एकाध बार वहां जाता रहूंगा लेकिन वहां के बच्चों से ऐसा लगाव हो गया कि मेरा मुंबई आने का मन ही नहीं होता। लेकिन, करियर की वजह से मुझे मुंबई लौटना ही पड़ा।

आपने एक फिल्म भी निर्देशित की ‘जाने भी क्यों दें यारों’ तो आसान क्या है दूसरों को निर्देशित करना या खुद किसी दूसरे के निर्देशन में काम करना?
निर्देशन बहुत मुश्किल काम है और बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी। मैंने इंडस्ट्री के बहुत बड़े कलाकार कबीर बेदी को निर्देशित किया है। वह हॉलीवुड तक काम कर आए हैं। किसी को निर्देशित करने के लिए आपके पास वैसा अधिकार और उतनी ही जानकारी होनी चाहिए। अभिनय करना आसाना काम है। जब बुलाया जाए तो जाकर कैमरे के सामने शॉट दे दो नहीं तो आराम करो। निर्देशक का काम कैमरा बंद होने के बाद भी जारी रहता है।

सीक्वल और सीजन के नाम पर बढ़ने वाली कहानियों से आप कितना इत्तेफाक रखते हैं?
दो साल के ब्रेक के बाद मैं कैमरे के सामने लौटा हूं और शुरुआत एक दूजे के वास्ते जैसे सुपरहिट सीरियल के दूसरे सीजन से कर रहा हूं। पहले से लोकप्रिय रही किसी फिल्म या सीरीज का सीक्वल या अगला सीजन बनाने में जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। सिर्फ कलाकारों की ही नहीं, शो के निर्माताओं, निर्देशकों और संबंधित प्लेटफॉर्म की भी जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। मेरा मानना है कि सीक्वल या अगला सीजन को पहले से बने नाम को आगे ही बढ़ाना चाहिए। पहले वाले के असर को कम नहीं करना चाहिए।

अभिनेता अक्षय आनंद को हिंदी सिनेमा में देव आनंद की खोज माना जाता है। पुरखे उनके अंग्रेजों की फौज में रहे, पिता ने एटा में छावनी बसाई और उन्हें बचपन में नाम मिला जॉन गार्डनर। सिनेमा और टेलीविजन में अपने अब तक के सफर और अपनी इस यात्रा के कुछ रोचक किस्सों को अक्षय ने साझा किया पंकज शुक्ल के साथ इस खास बातचीत में।

आपके नाम के साथ जुड़े आनंद की क्या कहानी है? लोग समझते हैं कि ये नाम आपको देव आनंद ने दिया।
नहीं, यह नाम मुझे देव साहब ने नहीं दिया। मैंने जब देव आनंद के साथ पहली फिल्म हम नौजवान की तो उसमें मेरा नाम आता है, जॉनी गार्डनर। देव साहब ने मुझे लॉन्च किया, उसके बाद मैंने आनंद महेंद्रू के साथ एक धारावाहिक किया, इंद्रधनुष। ये तीस साल पहले की बात है। इस दौरान मुझे एक ऐसा नाम रखने की सलाह मिले जिसे भारतीय दर्शक अपना मान सकें। मैंने शर्त रखी कि मैं अपना हिंदी नाम तो रख लूंगा लेकिन मेरे नाम के पीछे आनंद जरूर होना चाहिए। मैंने अपना हिंदी नाम उस शख्स को समर्पित किया जिसने मेरे अंदर के हुनर को पहचाना, और मुझे एक अभिनेता के तौर पर दुनिया से परिचित कराया। उसी समय आनंद ने अपने भतीजे का नाम अक्षय रखा था जिसे उन्होंने मुझे भी दिया। मैंने कहा कि अक्षय आनंद थोड़ा जुबान को तकलीफ देने वाला नाम है। तो उन्होंने कहा कि जो नाम बोलते समय जुबान को तकलीफ देते हैं, वही असरदार होते हैं।




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